आजाद हिंद फौज के असली जनक कौन थे? रास बिहारी बोस की कहानी
रास बिहारी बोस की कहानी किसी हॉलीवुड की थ्रिलर फिल्म से कम नहीं है। यह एक ऐसे क्रांतिकारी की दास्तान है जिसने अंग्रेजों की नाक के नीचे रहकर उन्हें बर्बाद करने की साजिश रची और जब पकड़े जाने का वक्त आया, तो भेस बदलकर देश छोड़ दिया और विदेश में जाकर भारत की पहली आजाद सेना खड़ी कर दी।
वह क्रांतिकारी, जिससे खौफ खाकर अंग्रेजों ने अपनी राजधानी बदल दी!
क्या आप किसी ऐसे इंसान की कल्पना कर सकते हैं, जो ब्रिटिश वायसराय की आंखों में धूल झोंककर उनके ऊपर बम फेंक दे और फिर उन्हीं के बीच छिपकर गायब हो जाए? एक ऐसा मास्टरमाइंड जिसे अंग्रेज 'भारत का सबसे खतरनाक बागी' कहते थे, लेकिन वो कभी उनके हाथ नहीं आया। यह कहानी है महान क्रांतिकारी रास बिहारी बोस की, जिन्होंने न केवल भारत के अंदर गदर मचाया, बल्कि जापान में जाकर 'आजाद हिंद फौज' की नींव रखी, जिसे बाद में नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने आगे बढ़ाया।
रास बिहारी बोस का जन्म बंगाल में हुआ था, लेकिन उनके इरादे पूरे भारत को आजाद कराने के थे। वे कोई साधारण क्रांतिकारी नहीं थे; वे भेस बदलने में इतने माहिर थे कि अंग्रेजों की जासूसी टीम भी उन्हें पहचान नहीं पाती थी।
उनकी वीरता का सबसे मशहूर किस्सा साल 1912 का है। अंग्रेज अपनी राजधानी कोलकाता से हटाकर दिल्ली ला रहे थे। उस वक्त के ब्रिटिश वायसराय लॉर्ड हार्डिंग का दिल्ली के चांदनी चौक में भव्य स्वागत हो रहा था। रास बिहारी बोस ने एक ऐसी योजना बनाई जिसने ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिला दी। वे खुद भेस बदलकर वहां पहुंचे और वायसराय के हाथी पर बम फेंक दिया। धमाका इतना जबरदस्त था कि वायसराय घायल हो गया और अंग्रेजों में भगदड़ मच गई। लेकिन ताज्जुब की बात यह है कि इतनी कड़ी सुरक्षा के बावजूद, रास बिहारी बोस वहां से बड़ी सफाई से निकल गए और महीनों तक अंग्रेजों को छकाते रहे।
इसके बाद उन्होंने साल 1915 में 'गदर विद्रोह' की योजना बनाई, जिसमें उनका साथ महान क्रांतिकारी करतार सिंह सराभा ने दिया। उनकी योजना थी कि भारतीय सैनिक एक साथ ब्रिटिश फौज के खिलाफ विद्रोह कर दें। लेकिन एक गद्दार की मुखबिरी की वजह से यह योजना असफल हो गई। चारों तरफ धरपकड़ शुरू हो गई, लेकिन रास बिहारी बोस फिर से अंग्रेजों को चकमा देने में कामयाब रहे और 'पी.एन. ठाकुर' के फर्जी नाम से पासपोर्ट बनवाकर जापान निकल गए।
जापान में भी अंग्रेजों ने उनका पीछा नहीं छोड़ा। ब्रिटिश सरकार ने जापान पर दबाव बनाया कि बोस को उन्हें सौंप दिया जाए। लेकिन जापान के कुछ प्रभावशाली लोगों ने उन्हें अपने घर में छिपाकर रखा। वहां उन्होंने जापानी लड़की से शादी की और जापान की नागरिकता ले ली ताकि अंग्रेज उन्हें कानूनी रूप से न पकड़ सकें।
लेकिन विदेश में रहकर भी उनका दिल सिर्फ भारत के लिए धड़कता था। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान, उन्होंने जापान में रह रहे भारतीय कैदियों और प्रवासियों को इकट्ठा किया और 'इंडियन इंडिपेंडेंस लीग' बनाई। यही वह संगठन था जिसने आगे चलकर 'आजाद हिंद फौज' (INA) का रूप लिया। जब नेताजी सुभाष चंद्र बोस जापान पहुंचे, तो रास बिहारी बोस ने बिना किसी स्वार्थ के अपनी बनाई हुई पूरी सेना और संगठन नेताजी के हवाले कर दिया और उनसे कहा—"अब आप इस मशाल को आगे ले जाइए।"
रास बिहारी बोस ने हमें सिखाया कि क्रांति सिर्फ हथियारों से नहीं, बल्कि तेज दिमाग और निस्वार्थ त्याग से भी लड़ी जाती है। वे इतिहास के वो 'गुमनाम नायक' हैं जिन्होंने समुद्र पार जाकर भारत की आजादी की पटकथा लिखी थी। आज हम जिस आजाद हिंद फौज का गर्व से नाम लेते हैं, उसकी पहली ईंट रास बिहारी बोस ने ही रखी थी।